केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में एक महत्वपूर्ण और विस्तृत हलफनामा दाखिल किया है। इसमें स्पष्ट किया गया है कि अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के आरक्षण के दायरे में 'क्रीमी लेयर' (Creamy Layer) का सिद्धांत लागू नहीं होता है। सरकार ने उन सभी जनहित याचिकाओं (PIL) का पुरजोर विरोध किया है, जिनमें एससी-एसटी आरक्षण में भी क्रीमी लेयर का नियम जोड़ने और सरकारी नौकरियों में अधिक न्यायसंगत आरक्षण नीति बनाने की मांग की गई थी।
केंद्र सरकार के हलफनामे के मुख्य बिंदु और कानूनी तर्क
सरकार द्वारा अदालत में रखे गए जवाब में कई कानूनी और संवैधानिक पहलुओं को स्पष्ट किया गया है:
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सिर्फ ओबीसी और एसईबीसी पर लागू है नियम: केंद्र सरकार ने साफ किया है कि क्रीमी लेयर की अवधारणा केवल अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) और सामाजिक व शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्ग (SEBC) के आरक्षण के संदर्भ में है। मौजूदा कानूनी और संवैधानिक प्रावधानों में ऐसा कोई नियम या आधार नहीं है जो इसे एससी-एसटी पर लागू कर सके।
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मौलिक अधिकारों के हनन का अभाव: सरकार ने कहा कि जिन याचिकाओं के आधार पर यह मामला उठाया गया है, उनमें संविधान के तहत किसी भी मौलिक अधिकार के उल्लंघन का कोई ठोस या वैध जिक्र नहीं किया गया है।
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याचिकाकर्ताओं की मुख्य मांगें: पिछले साल 11 अगस्त को रमाशंकर प्रजापति और अन्य की तरफ से दाखिल की गई जनहित याचिकाओं में यह दलील दी गई थी कि यदि किसी एससी-एसटी परिवार का कोई सदस्य पहले से ही उच्च संवैधानिक पद या वरिष्ठ सरकारी नौकरी पर पहुंच चुका है, तो उसके बच्चों को आरक्षण का लाभ नहीं मिलना चाहिए। याचिका में यह भी मांग की गई थी कि आर्थिक रूप से बेहद कमजोर लोगों के लिए उप-श्रेणी (सब-कैटेगरी) बनाकर उन्हें प्रवेश और सरकारी नौकरियों में प्राथमिकता दी जाए।
सिर्फ संसद को एससी-एसटी सूची में बदलाव का अधिकार
सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय ने अपने हलफनामे में जोर देकर कहा है कि एससी और एसटी की सूची में किसी भी प्रकार का संशोधन या बदलाव करने का अधिकार केवल और केवल देश की संसद के पास सुरक्षित है:
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संविधान के अनुच्छेद 341 और 342: सरकार ने स्पष्ट किया कि संविधान के इन अनुच्छेदों के तहत किसी भी जाति या जनजाति को संबंधित सूची में शामिल करने या बाहर करने की शक्ति केवल संसद के पास है।
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इंदिरा साहनी मामले का हवाला: केंद्र ने प्रसिद्ध इंदिरा साहनी (मंडल आयोग) फैसले का हवाला देते हुए बताया कि एससी, एसटी और ओबीसी की पहचान विशुद्ध रूप से ऐतिहासिक, सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ेपन के आधार पर की जाती है, न कि केवल आर्थिक स्थिति के आधार पर।
इन तमाम कानूनी तर्कों और प्रावधानों का हवाला देते हुए केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध किया है कि इन जनहित याचिकाओं को पूरी तरह खारिज किया जाए।

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