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यूपी बोर्ड ऑफिस में फेल अभ्यर्थियों को बना रहे थे टॉपर: 20 हजार रुपये में दे रहे थे 95 फीसदी नंबर, वॉट्सएप पर भेजी जा रही थी मार्कशीट


उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा परिषद (यूपी बोर्ड) से एक बेहद चौंकाने वाला और बड़ा फर्जीवाड़ा उजागर हुआ है। बोर्ड ऑफिस से जुड़े दलालों और विभागीय कर्मचारियों के गठजोड़ ने पैसों के लालच में बोर्ड की परीक्षाओं की शुचिता को पूरी तरह ताक पर रख दिया था।

परीक्षा में अनुत्तीर्ण यानी फेल हुए अभ्यर्थियों को मोटी रकम लेकर टॉपर बनाने का यह काला धंधा खुलेआम चल रहा था। मात्र 20 हजार रुपये में अभ्यर्थियों को 95 फीसदी तक अंक दिलाने की गारंटी दी जा रही थी। इतना ही नहीं, संशोधन के बाद तैयार हुई नई मार्कशीट सीधे अभ्यर्थियों के वॉट्सएप पर भेजकर उनका विश्वास जीता जा रहा था। इस बड़े सिंडिकेट के पर्दाफाश के बाद शिक्षा विभाग में हड़कंप मच गया है।

1. 20 हजार रुपये में 95 फीसदी मार्क्स का फर्जीवाड़ा, ऐसे चलता था पूरा खेल

इस फर्जीवाड़े की नींव उन अभ्यर्थियों को निशाना बनाकर रखी जाती थी जो परीक्षा में कम अंक लाते थे या फिर फेल हो जाते थे। गिरोह के सदस्य ऐसे अभ्यर्थियों और उनके परिजनों से संपर्क साधते थे और पास कराने के साथ-साथ मनचाहे अंक दिलाने का प्रलोभन देते थे।

  • रेट कार्ड तय था: साधारण पास होने के लिए अलग रकम और 90 से 95 फीसदी नंबर लाकर टॉपर की सूची में आने के लिए 20 हजार रुपये तक का रेट तय किया गया था।

  • वॉट्सएप पर भेजी जाती थी मार्कशीट: सौदा तय होते ही अभ्यर्थी का रोल नंबर और विवरण लिया जाता था। काम पूरा होने का दावा करते हुए संशोधित अंक तालिका की फोटो वॉट्सएप पर भेज दी जाती थी, ताकि अभ्यर्थी तुरंत पूरा भुगतान कर दे।

2. रिकॉर्ड रूम से कॉपियां निकालकर बढ़ाए जाते थे नंबर

इस सिंडिकेट का नेटवर्क केवल बाहर के दलालों तक सीमित नहीं था, बल्कि बोर्ड ऑफिस के भीतर स्थित रिकॉर्ड रूम तक इसकी जड़ें फैली हुई थीं।

जांच में सामने आया है कि बोर्ड ऑफिस के अंदर मौजूद कर्मचारी पैसों के बदले मूल्यांकित उत्तर पुस्तिकाओं (कॉपियों) वाले रिकॉर्ड रूम से संबंधित अभ्यर्थी की असली कॉपी बाहर निकाल लेते थे। इसके बाद कॉपी के अंदर लिखे उत्तरों के आधार पर या फिर बाहर मुख्य पृष्ठ पर दिए गए अंकों के कॉलम में ओवरराइटिंग करके नंबर बढ़ा दिए जाते थे। इसके बाद संशोधित अंकों की एंट्री सीधे बोर्ड के मुख्य डेटाबेस और सर्वर पर अपडेट कर दी जाती थी।

3. शिकायत और आंतरिक जांच में हुआ घोटाले का भंडाफोड़

इस पूरे नेटवर्क का खुलासा तब हुआ जब एक अभ्यर्थी के नंबर अचानक से बहुत अधिक बढ़ जाने की शिकायत अधिकारियों तक पहुंची। स्क्रूटनी और पुनर्मूल्यांकन के मामलों की क्रॉस चेकिंग के दौरान पाया गया कि कुछ अभ्यर्थियों के मूल अंक और पोर्टल पर दिख रहे अंकों में जमीन-आसमान का अंतर था।

संदेह होने पर जब उच्च अधिकारियों ने जांच कमेटी का गठन किया और संबंधित विषयों की मूल उत्तर पुस्तिकाओं को रिकॉर्ड रूम से निकालकर देखा, तो उसमें साफ तौर पर कांट-छांट और फर्जी दस्तखत पाए गए। इसके बाद जब तकनीकी टीम ने सर्वर के लॉग इन और पासवर्ड की जांच की, तो पता चला कि यह काम बोर्ड ऑफिस के ही कुछ विशेष कंप्यूटरों से किया गया था।

4. विभागीय कर्मचारियों और दलालों पर कानूनी कार्रवाई की तैयारी

घोटाले की गंभीरता को देखते हुए शासन और शिक्षा विभाग ने सख्त रुख अख्तियार कर लिया है। इस मामले में शामिल बोर्ड ऑफिस के कर्मचारियों, कंप्यूटर ऑपरेटरों और बाहर सक्रिय दलालों को चिन्हित कर लिया गया है।

  • आपराधिक मामला दर्ज: धोखाधड़ी, कूटचित दस्तावेज तैयार करने और सरकारी रिकॉर्ड में हेरफेर करने के गंभीर आरोपों में संबंधित थाने में प्राथमिक दर्ज कराई जा रही है।

  • मार्कशीट होंगी रद्द: जिन अभ्यर्थियों ने पैसे देकर अपने अंक बढ़वाए थे, उनकी अंक तालिकाओं को जांच पूरी होने तक रोक दिया गया है और फर्जी पाए जाने पर उनकी उम्मीदवारी पूरी तरह से निरस्त की जाएगी।

  • प्रणाली होगी मजबूत: भविष्य में इस तरह की धांधली को रोकने के लिए बोर्ड अपने डेटाबेस और उत्तर पुस्तिकाओं के रख-रखाव के नियमों को और अधिक कड़ा करने जा रहा है।

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