पाकिस्तान और भारत के बीच कश्मीर मुद्दे को लेकर कई बार युद्ध हो चुके हैं। ऐतिहासिक रूप से पाकिस्तान सरकार ने हमेशा भारत के साथ कश्मीर विवाद को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सबसे बड़ा मुद्दा बनाकर पेश किया। इस भू-राजनीतिक खींचतान की वजह से पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) के स्थानीय निवासियों की जमीनी समस्याओं, आर्थिक तंगी और बुनियादी सुविधाओं की कमी पर दशकों तक बहुत कम ध्यान दिया गया।
लंबे समय तक शांत रहने वाला यह इलाका अब पाकिस्तान सरकार के लिए एक सबसे बड़ी घरेलू और रणनीतिक चुनौती बन चुका है। वहां के लोगों में वर्षों से पनप रहा असंतोष अब सड़कों पर खुलकर सामने आ गया है।
शुरुआत में बुनियादी महंगाई और बिजली के बिलों के खिलाफ शुरू हुआ यह विरोध प्रदर्शन अब एक संगठित और व्यापक राजनीतिक आंदोलन का रूप ले चुका है। इसे बीते कई दशकों में पाकिस्तान सरकार के सामने PoK से उभरी सबसे बड़ी राजनीतिक और सामाजिक चुनौती के रूप में देखा जा रहा है।
PoK में आंदोलन की कमान किसके हाथ में है?
PoK में चल रहे इस व्यापक जनांदोलन की कमान जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) के हाथों में है। इस संगठन का औपचारिक गठन वर्ष 2023 में हुआ था। यह कोई पारंपरिक राजनीतिक दल नहीं है, बल्कि इसमें स्थानीय व्यापारी संघ, नागरिक समाज के प्रतिनिधि, वकील, छात्र और विभिन्न क्षेत्रों के स्थानीय नेता शामिल हैं।
आंदोलन की शुरुआत और शुरुआती सफलता:
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महंगाई के खिलाफ मोर्चा: शुरुआत में इस नागरिक संगठन ने PoK में बिजली की अत्यधिक दरों, आटे की बढ़ती कीमतों और गेहूं पर दी जाने वाली सब्सिडी को खत्म करने के खिलाफ आंदोलन शुरू किया था।
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सरकार को झुकने पर मजबूर किया: वर्ष 2024 और वर्ष 2025 के दौरान PoK में हुए विशाल प्रदर्शनों, चक्का जाम और हड़तालों के आगे पाकिस्तान सरकार को घुटने टेकने पड़े।
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राहत और सब्सिडी: पाकिस्तान की केंद्र सरकार को मजबूरन बिजली की दरें घटानी पड़ीं और गेहूं पर सब्सिडी बहाल करनी पड़ी। इसके परिणामस्वरूप PoK में आटा और आवश्यक सामग्रियां पाकिस्तान के अन्य प्रांतों की तुलना में काफी सस्ती दरों पर मिलने लगीं।
12 रिजर्व सीटें रद्द करने की मांग पर क्यों अड़ा है आंदोलन?
शुरुआती आंदोलनों में मिली ऐतिहासिक सफलताओं ने जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) के जनाधार को बहुत मजबूत कर दिया। इसके बाद स्थानीय लोगों का विश्वास बढ़ा और अब यह संगठन केवल सब्सिडी तक सीमित न रहकर PoK को अधिक स्वायत्तता और वास्तविक राजनीतिक अधिकार देने की मांग उठा रहा है।
वर्तमान में इस आंदोलन की सबसे मुख्य मांग PoK विधानसभा की कुल 45 निर्वाचित सीटों में से 12 आरक्षित सीटों को पूरी तरह से समाप्त करना है।
क्या है 12 आरक्षित सीटों का गणित?
PoK की विधानसभा में यह 12 सीटें उन कश्मीरी शरणार्थियों के लिए आरक्षित रखी गई हैं, जो 1947 और उसके बाद के वर्षों में वहां से स्थानांतरित होकर पाकिस्तान के विभिन्न शहरों जैसे कराची, लाहौर, रावलपिंडी और इस्लामाबाद में बस चुके हैं।
प्रदर्शनकारियों की मुख्य आपत्तियां:
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स्थानीय जनमत का अपमान: आंदोलनकारियों का स्पष्ट कहना है कि जो लोग वर्षों से पाकिस्तान के मुख्य शहरों में रह रहे हैं और वहां की नागरिक सुविधाओं का लाभ उठा रहे हैं, उन्हें PoK की सरकार चुनने या वहां के लिए नीतियां बनाने का कोई नैतिक अधिकार नहीं होना चाहिए।
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स्थानीय अधिकारों का हनन: इन 12 सीटों पर बाहरी मतदाताओं का दबदबा होने के कारण PoK में रहने वाले मूल निवासियों के वोट का मूल्य कम हो जाता है।
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केंद्र की राजनीतिक कठपुतली: JAAC के अनुसार, इन 12 आरक्षित सीटों का उपयोग हमेशा इस्लामाबाद में सत्ता पर काबिज राजनीतिक दल द्वारा किया जाता है। केंद्र सरकार इन सीटों पर अपने पसंदीदा उम्मीदवारों को जिताकर PoK में अपनी मनपसंद सरकार बना लेती है, जिससे स्थानीय जनता का वास्तविक प्रतिनिधित्व खारिज हो जाता है।
पाकिस्तान सरकार इन मांगों को स्वीकार क्यों नहीं कर रही है?
पाकिस्तान की केंद्र सरकार के लिए प्रदर्शनकारियों की इन मांगों को मानना एक बड़ी राजनीतिक और रणनीतिक मुसीबत बन गया है। सरकार के पीछे हटने में कई मुख्य अड़चनें हैं:
1. PoK पर राजनीतिक नियंत्रण खोने का भय
यदि ये 12 आरक्षित सीटें खत्म कर दी जाती हैं, तो इस्लामाबाद का PoK की प्रांतीय सरकार पर सीधा नियंत्रण समाप्त हो जाएगा। इसके बाद PoK में ऐसी स्थानीय सरकारें चुनकर आ सकती हैं जो केंद्र के फैसलों का विरोध करें।
2. संवैधानिक और कानूनी जटिलताएं
PoK का शासन एक विशेष प्रशासनिक ढांचे के तहत चलाया जाता है। इन सीटों को खत्म करने के लिए पाकिस्तान की संसद और PoK के विधायी ढांचे में बड़े पैमाने पर बदलाव करने होंगे, जिससे केंद्र सरकार बचना चाहती है।
3. अन्य क्षेत्रों में विरोध फैलने की आशंका
पाकिस्तान इस समय पहले से ही बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा जैसे प्रांतों में गंभीर असंतोष का सामना कर रहा है। यदि सरकार PoK में प्रदर्शनकारियों की राजनीतिक मांगें स्वीकार कर लेती है, तो देश के अन्य असंतुष्ट इलाकों में भी इसी तरह की स्वायत्तता की मांगें जोर पकड़ सकती हैं।
भविष्य की राह और निष्कर्ष
PoK में स्थिति अब केवल आर्थिक राहत तक सीमित नहीं रह गई है। वर्षों से उपेक्षित रहे स्थानीय लोग अब अपने राजनीतिक अधिकारों, संसाधनों पर अपने नियंत्रण और अपने क्षेत्र के भविष्य का फैसला खुद करने की मांग कर रहे हैं।
यदि पाकिस्तान सरकार ने बल प्रयोग करने के बजाय बातचीत के जरिए इन मांगों का कोई स्थायी और पारदर्शी समाधान नहीं निकाला, तो आने वाले समय में PoK में हालात और अधिक विस्फोटक हो सकते हैं।

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