28 फरवरी से 3 अगस्त तक, यानी पिछले 5 महीनों की समय अवधि में आम आदमी और मध्यम वर्ग के परिवारों का खाने-पीने का दैनिक बजट बहुत तेजी से बढ़ा है। उल्लेखनीय है कि 28 फरवरी वही तारीख है जब अमेरिका, ईरान और इजराइल के बीच तनाव और युद्ध की स्थितियां शुरू हुई थीं। इस वैश्विक अस्थिरता और स्थानीय कारकों के कारण देश में खाद्य पदार्थों की कीमतों में अभूतपूर्व उछाल देखने को मिला है।
उपभोक्ता मामलों के विभाग (Department of Consumer Affairs) के प्राइस मॉनिटरिंग सिस्टम द्वारा जारी आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, इन 5 महीनों के दौरान देश की 16 सबसे मुख्य खाद्य वस्तुओं में से 15 वस्तुओं के दामों में सीधी और भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई है। इस पूरी अवधि में सबसे ज्यादा आर्थिक दबाव दालों और रसोई में इस्तेमाल होने वाले खाद्य तेलों की कीमतों पर पड़ा है।
जानिए कौन सी दैनिक वस्तु कितनी महंगी हुई
खाद्य पदार्थों की कीमतों में आई इस चौतरफा तेजी ने आम भारतीय परिवार के महीने भर के राशन बजट को पूरी तरह से बिगाड़ कर रख दिया है। दैनिक उपभोग की प्रमुख वस्तुओं के प्रति किलो और प्रति लीटर दामों में निम्नलिखित अंतर दर्ज किया गया है:
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सरसों तेल: 7.56 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी
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अरहर दाल: 5.96 रुपये प्रति किलो की बढ़ोतरी
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उड़द दाल: 5.71 रुपये प्रति किलो की बढ़ोतरी
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चना दाल: 4.65 रुपये प्रति किलो की बढ़ोतरी
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मूंग दाल: 4.55 रुपये प्रति किलो की बढ़ोतरी
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दूध: 3.00 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी
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चीनी: 2.25 रुपये प्रति किलो की बढ़ोतरी
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चावल: 1.57 रुपये प्रति किलो की बढ़ोतरी
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नमक: 0.85 रुपये प्रति किलो की बढ़ोतरी
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आटा: 0.22 रुपये प्रति किलो की मामूली बढ़ोतरी
चीनी और आटे की कीमतों का पूरा गणित
रसोई में इस्तेमाल होने वाली दो सबसे बुनियादी चीजों- चीनी और आटे की कीमतों का मिजाज इस दौरान अलग-अलग रहा।
चीनी की कीमतों में आई 2.25 रुपये प्रति किलो की बढ़ोतरी के पीछे मुख्य कारण एथेनॉल उत्पादन के लिए गन्ने की लगातार बनी हुई ऊंची मांग है। सरकार द्वारा हरित ईंधन को बढ़ावा देने के कारण मिलों द्वारा गन्ने का बड़ा हिस्सा एथेनॉल बनाने में इस्तेमाल किया जा रहा है। इसके साथ ही, इस सीजन में चीनी के कुल उत्पादन में आई अपेक्षाकृत कमी को भी बाजार में चीनी महंगी होने का एक प्रमुख कारण माना जा रहा है।
दूसरी तरफ, गेहूं के पर्याप्त सरकारी भंडार (बफर स्टॉक) और खुले बाजार में गेहूं की बेहतर उपलब्धता के चलते इसके दाम नियंत्रण में रहे। इसी वजह से गेहूं के आटे की कीमत में केवल 22 पैसे प्रति किलो का मामूली अंतर आया है और इसके दाम लगभग स्थिर बने हुए हैं, जिससे आम जनता को रोटी के मोर्चे पर राहत मिली है।
अगस्त से शुरू हो रहा त्योहारी सीजन बढ़ा सकता है आम जनता की चिंताएं
कृषि और बाजार विशेषज्ञों का स्पष्ट कहना है कि दालों की कीमतों में इस अचानक आई तेजी की सबसे बड़ी वजह इस साल का कमजोर और असमान मानसून रहा है। मानसून की शुरुआती धीमी रफ्तार के कारण जुलाई के अंत तक खरीफ फसलों के तहत दालों की बुवाई का कुल रकबा पिछले साल की तुलना में लगभग 7 प्रतिशत कम दर्ज किया गया है। स्थानीय स्तर पर उत्पादन घटने और विदेशी बाजारों से महंगे दामों पर आयात करने की आशंका के चलते भारतीय बाजारों में दालों की कीमतें लगातार ऊपर चढ़ रही हैं।
अब अगस्त महीने से देश में रक्षाबंधन, जन्माष्टमी, गणेशोत्सव, नवरात्र और दीपावली जैसे बड़े त्योहारों की शुरुआत हो रही है। इस त्योहारी सीजन के दौरान मिठाई बनाने, पकवान बनाने और घरेलू खपत के लिए दालों, चीनी और खाद्य तेलों की मांग में कई गुना वृद्धि होती है।
यदि आने वाले समय में वैश्विक स्तर पर खाद्य वस्तुओं की कीमतों और समुद्री परिवहन लागत में कमी नहीं आती है, तो त्योहारों के दौरान इन सभी वस्तुओं की कीमतों पर और अधिक दबाव बनने की पूरी संभावना दिख रही है, जिससे आम जनता की जेब पर अतिरिक्त भार पड़ेगा।
महंगाई बढ़ने की तीन सबसे बड़ी मुख्य वजहें
इंफोमेरिक्स रेटिंग्स के मुख्य अर्थशास्त्री (Chief Economist) डॉ. मनोरंजन शर्मा के अनुसार, वर्तमान समय में दालों और खाद्य तेलों की कीमतों पर बहुकोणीय दबाव बना हुआ है। इसके पीछे तीन मुख्य अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय कारक जिम्मेदार हैं:
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कमजोर मानसून और घटती बुवाई क्षेत्र: देश के कई प्रमुख कृषि राज्यों में असमान और अप्रत्याशित बारिश के कारण खरीफ सीजन में दालों का बुवाई क्षेत्र घटा है। इससे आने वाले महीनों में दलहन की कुल पैदावार कम होने की चिंता गहराई हुई है।
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अंतरराष्ट्रीय खाद्य तेल बाजारों में उछाल: भारत अपनी कुल खाद्य तेल आवश्यकताओं का एक बड़ा हिस्सा विदेशों से आयात करता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में पाम ऑयल और सोयाबीन तेल की कीमतों में आई भारी तेजी का सीधा और नकारात्मक असर भारतीय खुदरा बाजार पर पड़ा है।
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पश्चिम एशिया में जियो-पॉलिटिकल तनाव: अमेरिका, ईरान और इजराइल के बीच जारी युद्ध और तनाव की वजह से समुद्री व्यापारिक मार्ग (जैसे लाल सागर और होर्मुज जलडमरूमध्य) अत्यधिक प्रभावित हुए हैं। जहाजों का रास्ता बदलने और बीमा प्रीमियम बढ़ने के कारण आयात की कुल परिवहन लागत काफी बढ़ गई है, जिसने महंगाई को और हवा दी है।

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