भोपाल। मध्य प्रदेश के सरकारी स्कूलों में कक्षा पहली से आठवीं तक पढ़ने वाले करीब 56 लाख विद्यार्थियों को इस शैक्षणिक सत्र में अब तक नई स्कूल पोशाक नहीं मिल सकी है। पोशाक की सिलाई और आपूर्ति के लिए प्रस्तावित करीब 350 करोड़ रुपए की निविदा प्रक्रिया न्यायालय की अंतरिम रोक के कारण आगे नहीं बढ़ पाई। इसके बाद स्कूल शिक्षा विभाग व्यवस्था में बदलाव की तैयारी कर रहा है। अब विद्यार्थियों को सिली हुई पोशाक उपलब्ध कराने के बजाय उसके लिए निर्धारित राशि सीधे उनके बैंक खातों में भेजने का प्रस्ताव तैयार किया जा रहा है।
करीब 56 लाख विद्यार्थियों पर पड़ा असर
प्रदेश के सरकारी स्कूलों में कक्षा पहली से आठवीं तक बड़ी संख्या में विद्यार्थी अध्ययनरत हैं। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार इन कक्षाओं में करीब 56.62 लाख विद्यार्थी हैं। इनमें पहली से पांचवीं कक्षा तक 34.36 लाख से अधिक और छठवीं से आठवीं कक्षा तक 22.25 लाख से अधिक विद्यार्थी शामिल हैं।
नए शैक्षणिक सत्र की शुरुआत अप्रैल में हो चुकी है, लेकिन पोशाक की आपूर्ति व्यवस्था तय समय पर आगे नहीं बढ़ सकी। इससे विद्यार्थियों को नई पोशाक मिलने में विलंब हुआ है।
पहले मिलती थी 600 रुपए की सहायता
इससे पहले सरकारी विद्यालयों के विद्यार्थियों को दो जोड़ी पोशाक के लिए 600 रुपए की सहायता दी जाती थी। इस राशि का उपयोग विद्यार्थी और उनके परिवार अपनी सुविधा के अनुसार पोशाक तैयार कराने में करते थे। वर्ष 2026-27 के शैक्षणिक सत्र से सरकार ने इस व्यवस्था में बदलाव करते हुए विद्यार्थियों को तैयार पोशाक उपलब्ध कराने का निर्णय लिया था।
नई व्यवस्था के तहत मध्य प्रदेश पाठ्यपुस्तक निगम ने करीब 350 करोड़ रुपए की पोशाक आपूर्ति के लिए 3 जून 2026 को खुली निविदा जारी की थी। पोशाक की आपूर्ति को कक्षा और विद्यार्थियों की श्रेणी के अनुसार अलग-अलग वर्गों में बांटने की योजना थी।
न्यायालय की रोक से अटकी निविदा
पोशाक आपूर्ति की निविदा प्रक्रिया को लेकर बुनकर संगठनों और अन्य पक्षों ने मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय का रुख किया। याचिकाकर्ताओं ने निविदा की प्रक्रिया और उसकी शर्तों पर आपत्ति जताई तथा इसे मध्य प्रदेश भंडार क्रय नियम 2023 के अनुरूप नहीं होने का आरोप लगाया।
जबलपुर स्थित उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने अगस्त में करीब 350 करोड़ रुपए की पोशाक आपूर्ति निविदा को अंतिम रूप देने पर अंतरिम रोक लगा दी। न्यायालय ने राज्य सरकार और संबंधित पक्षों से जवाब भी मांगा है।
बुनकर संगठनों ने भी उठाए सवाल
मामले में याचिकाकर्ता बुनकर संगठनों का कहना है कि लंबे समय से राज्य स्तरीय पावरलूम सहकारिता समिति के माध्यम से सरकारी विद्यालयों की पोशाक की आपूर्ति की व्यवस्था रही है। उनका दावा है कि नई खुली निविदा व्यवस्था से प्रदेश के पावरलूम, कताई मिलों और बुनकरों से जुड़े करीब दो लाख परिवारों की आजीविका प्रभावित हो सकती है।
दूसरी ओर, निविदा प्रक्रिया पर रोक लगने के बाद विद्यार्थियों तक समय पर पोशाक पहुंचाना विभाग के सामने बड़ी चुनौती बन गया है।
अब सीधे खाते में राशि भेजने की तैयारी
निविदा प्रक्रिया में विलंब और न्यायालय की रोक के बीच स्कूल शिक्षा विभाग अब पुरानी व्यवस्था की ओर लौटने पर विचार कर रहा है। प्रस्ताव के अनुसार विद्यार्थियों को तैयार पोशाक देने के बजाय दो जोड़ी पोशाक के लिए निर्धारित राशि सीधे उनके बैंक खातों में भेजी जा सकती है।
इसके लिए विभाग की ओर से संशोधित प्रस्ताव मंत्रिमंडल के समक्ष रखने की तैयारी है। मंत्रिमंडल की मंजूरी मिलने के बाद ही राशि सीधे खातों में भेजने की व्यवस्था लागू हो सकेगी। फिलहाल प्रति विद्यार्थी कितनी राशि दी जाएगी, इस पर अंतिम निर्णय होना बाकी है।
तैयार पोशाक पहुंचाना भी बड़ी चुनौती
प्रदेशभर के लाखों विद्यार्थियों के लिए तैयार पोशाक तैयार कराना और फिर उसे अलग-अलग जिलों के विद्यालयों तक पहुंचाना समय लेने वाली प्रक्रिया है। विद्यार्थियों की संख्या अधिक होने के कारण पोशाक की सिलाई, गुणवत्ता की जांच, पैकेजिंग और विद्यालयों तक वितरण में भी पर्याप्त समय लग सकता है।
इसी कारण विभाग के सामने समयबद्ध तरीके से विद्यार्थियों को पोशाक उपलब्ध कराने का दबाव है। शैक्षणिक सत्र का बड़ा हिस्सा बीतने के बाद अब व्यवस्था में बदलाव पर तेजी से विचार किया जा रहा है।
विद्यार्थियों और परिवारों को निर्णय का इंतजार
पोशाक को लेकर अंतिम निर्णय होने तक विद्यार्थियों और उनके परिवारों को सरकार की नई व्यवस्था का इंतजार रहेगा। यदि सीधे खाते में राशि भेजने के प्रस्ताव को मंजूरी मिलती है तो परिवार अपनी सुविधा के अनुसार विद्यार्थियों के लिए पोशाक तैयार करा सकेंगे।
फिलहाल 350 करोड़ रुपए की निविदा न्यायालयी प्रक्रिया में अटकी हुई है और सरकार के सामने दो प्रमुख चुनौतियां हैं। पहली, लाखों विद्यार्थियों तक समय पर पोशाक का लाभ पहुंचाना और दूसरी, पोशाक आपूर्ति से जुड़े बुनकरों तथा अन्य स्थानीय इकाइयों के हितों को ध्यान में रखते हुए उचित व्यवस्था तैयार करना।

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