भोपाल। मंत्री विजय शाह को लेकर मध्य प्रदेश की राजनीति में विवाद लगातार गहराता जा रहा है। शाह के खिलाफ अभियोजन की अनुमति नहीं देने के सरकार के निर्णय के बाद कांग्रेस ने मुख्यमंत्री और पूरी मंत्रिपरिषद को निशाने पर लिया है। कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी ने राष्ट्रपति को पत्र लिखकर हस्तक्षेप की मांग की है, जबकि नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने राज्यपाल को पत्र भेजकर विजय शाह के खिलाफ मुकदमा चलाने की अनुमति देने की मांग उठाई है।
कांग्रेस नेताओं का कहना है कि मामले में विशेष जांच दल द्वारा अभियोजन की अनुमति मांगे जाने के बावजूद सरकार की ओर से इसे मंजूरी नहीं देना गंभीर संवैधानिक और न्यायिक प्रश्न खड़े करता है।
पटवारी बोले, संवैधानिक व्यवस्था की गरिमा बनी रहनी चाहिए
कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी ने राष्ट्रपति से मामले में तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है। उन्होंने कहा कि विजय शाह प्रकरण में संवैधानिक और न्यायिक व्यवस्था की गरिमा की रक्षा होना जरूरी है।
पटवारी ने आरोप लगाया कि सरकार द्वारा उठाया गया कदम उचित नहीं है और ऐसी स्थिति में पूरी सरकार की जवाबदेही तय होनी चाहिए। उन्होंने प्रधानमंत्री से भी स्पष्ट करने की मांग की कि विजय शाह को लेकर राज्य सरकार द्वारा लिए गए निर्णय से वे सहमत हैं या नहीं।
उन्होंने कहा कि सेना का सम्मान किसी राजनीतिक दल तक सीमित विषय नहीं है, बल्कि यह देश के प्रत्येक नागरिक के राष्ट्रीय सम्मान से जुड़ा है।
उमंग सिंघार ने राज्यपाल से मांगी कार्रवाई
नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने राज्यपाल को पत्र लिखकर विजय शाह के खिलाफ अभियोजन की अनुमति देने की मांग की है। उनका कहना है कि मंत्री के लिए अलग कानून नहीं हो सकता।
सिंघार ने सवाल उठाया कि जब मामले की जांच करने वाली विशेष जांच दल ने भी अभियोजन की अनुमति की आवश्यकता जताई है, तो फिर सरकार की ओर से इसे रोकने का आधार क्या है।
कांग्रेस का आरोप है कि विजय शाह ने कर्नल सोफिया कुरैशी के संबंध में आपत्तिजनक टिप्पणी कर गंभीर मर्यादा का उल्लंघन किया था। विपक्ष का कहना है कि यह विषय केवल किसी एक व्यक्ति की प्रतिष्ठा से जुड़ा नहीं है, बल्कि भारतीय सेना की गरिमा से भी संबंधित है।
सरकार के निर्णय पर कानूनी सवाल
मामले में वरिष्ठ अधिवक्ता रामेश्वर सिंह ठाकुर ने सरकार के निर्णय को लेकर न्यायालय की अवमानना की कार्रवाई की तैयारी शुरू करने की बात कही है। वह इस प्रकरण से जुड़े मूल मामले में पहले भी हस्तक्षेप कर चुके हैं।
उनका कहना है कि न्यायालय के निर्देशों के बावजूद अभियोजन की अनुमति को लंबित रखना संवैधानिक व्यवस्था के अनुरूप नहीं है। उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 129 और 215 का उल्लेख करते हुए कहा कि सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय अभिलेख न्यायालय हैं तथा न्यायिक आदेशों की जानबूझकर अवहेलना होने पर अवमानना की कार्रवाई का प्रावधान है।
अनुच्छेद 14 को लेकर भी उठाया सवाल
वरिष्ठ अधिवक्ता ने अभियोजन की अनुमति के प्रावधान को लेकर संविधान के अनुच्छेद 14 का भी उल्लेख किया। उनका तर्क है कि अभियोजन की स्वीकृति किसी व्यक्ति के लिए कानूनी सुरक्षा की ऐसी ढाल नहीं बन सकती, जिसका इस्तेमाल मामले को अनिश्चितकाल तक रोकने के लिए किया जाए।
उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि अभियोजन की अनुमति के मामले में निर्णय निष्पक्ष और निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के अनुसार होना चाहिए।
उनका यह भी कहना है कि मंत्री भी लोक सेवक के दायरे में आते हैं। यदि मंत्रिपरिषद का निर्णय पक्षपातपूर्ण माना जाता है तो राज्यपाल की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है।
120 दिन में निर्णय का भी उठाया मुद्दा
अधिवक्ता रामेश्वर सिंह ठाकुर ने नई आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 218 का हवाला देते हुए कहा कि अभियोजन की अनुमति के संबंध में निर्धारित अवधि के भीतर निर्णय लिया जाना चाहिए। उन्होंने दावा किया कि 120 दिन के भीतर निर्णय नहीं होने की स्थिति में स्वतः स्वीकृति से संबंधित कानूनी प्रावधान भी लागू होता है।
हालांकि, इस प्रावधान की वास्तविक कानूनी स्थिति और इस मामले में इसकी प्रयोज्यता का अंतिम निर्धारण न्यायालय द्वारा किया जाना है।
विवेक तन्खा बोले, कैबिनेट के अधिकार पर सवाल
वरिष्ठ अधिवक्ता और राज्यसभा सदस्य विवेक तन्खा ने भी सरकार के निर्णय पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि विजय शाह के खिलाफ मुकदमा चलाने की अनुमति दी जाए या नहीं, इस संबंध में निर्णय लेने का अधिकार केवल मंत्रिपरिषद के स्तर पर तय नहीं किया जा सकता।
तन्खा के अनुसार, अब मामले में राज्यपाल की भूमिका महत्वपूर्ण हो गई है। राज्यपाल इस विषय में क्या निर्णय लेते हैं, उससे आगे की कानूनी प्रक्रिया की दिशा तय हो सकती है।
राज्यपाल को भेजा जा सकता है कैबिनेट का निर्णय
सूत्रों के अनुसार, राज्य सरकार की ओर से मंत्रिपरिषद का निर्णय राज्यपाल को भेजे जाने की संभावना है। इसके बाद लगातार तीन दिन का अवकाश रहेगा और 31 अगस्त को सर्वोच्च न्यायालय में इस मामले की सुनवाई प्रस्तावित है।
सुनवाई से पहले शासन की ओर से मामले से संबंधित कानूनी पक्ष तैयार किया जाएगा। विजय शाह की ओर से पैरवी कर रहे अधिवक्ता को भी सरकार के निर्णय और संबंधित दस्तावेजों की जानकारी दिए जाने की संभावना है, ताकि न्यायालय के समक्ष सरकार का पक्ष प्रस्तुत किया जा सके।
31 अगस्त की सुनवाई पर टिकी नजर
विजय शाह प्रकरण अब राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से आगे बढ़कर संवैधानिक और कानूनी बहस का विषय बन गया है। एक ओर सरकार का निर्णय है, वहीं दूसरी ओर विपक्ष और कानून विशेषज्ञ अभियोजन की अनुमति रोकने के औचित्य पर सवाल उठा रहे हैं।
अब राज्यपाल के रुख और सर्वोच्च न्यायालय में होने वाली 31 अगस्त की सुनवाई से मामले की अगली दिशा तय होने की उम्मीद है। फिलहाल कांग्रेस सरकार पर मंत्री को संरक्षण देने का आरोप लगा रही है, जबकि कानूनी स्तर पर अभियोजन की अनुमति और राज्यपाल की भूमिका को लेकर बहस जारी है।

✍️ प्रतिक्रिया दें (Leave a Comment)