देश में चीनी की बढ़ती कीमतों को लेकर सरकार ने स्थिति स्पष्ट की है। सरकार ने उन दावों को खारिज कर दिया है, जिनमें चीनी से एथेनॉल बनाने को बाजार में चीनी महंगी होने की मुख्य वजह बताया जा रहा था।
खाद्य और उपभोक्ता मंत्रालय ने शुक्रवार को कहा कि चीनी की कीमतों में हालिया बढ़ोतरी के पीछे कम उत्पादन, त्योहारों के दौरान बढ़ी मांग और जमाखोरी प्रमुख कारण हैं। कीमतों पर नियंत्रण रखने के लिए सरकार ने भंडारण सीमा तय करने और शुल्क मुक्त आयात जैसे कदम भी उठाए हैं।
एथेनॉल के लिए चीनी का इस्तेमाल कम हुआ
मंत्रालय के अनुसार, चीनी की कीमतों में बढ़ोतरी को एथेनॉल उत्पादन से जोड़ना सही नहीं है। पेट्रोल में मिलाने के लिए चीनी से एथेनॉल बनाने की हिस्सेदारी पिछले कुछ वर्षों में कम हुई है।
2022-23 के मौसम में एथेनॉल उत्पादन के लिए चीनी के इस्तेमाल की हिस्सेदारी करीब 12 प्रतिशत थी। 2025-26 के मौसम में यह घटकर करीब 9 प्रतिशत रह गई है।
सरकार के अनुसार, देश में कुल एथेनॉल उत्पादन का करीब 75 प्रतिशत हिस्सा अब अनाज, खासकर मक्के से तैयार किया जा रहा है। ऐसे में चीनी से एथेनॉल बनाने को मौजूदा कीमत बढ़ोतरी की प्रमुख वजह बताना उचित नहीं है।
अतिरिक्त चीनी का एथेनॉल उत्पादन में इस्तेमाल
भारत में हर वर्ष करीब 3.2 से 3.4 करोड़ टन चीनी का उत्पादन होता है, जबकि घरेलू खपत करीब 2.8 से 2.9 करोड़ टन रहती है।
उत्पादन और खपत के बीच अंतर के कारण पहले अतिरिक्त चीनी मिलों में पड़ी रहती थी। इससे मिलों की पूंजी लंबे समय तक अटकी रहती थी और गन्ना किसानों को भुगतान करने में परेशानी आती थी।
सरकार ने अतिरिक्त चीनी और गन्ने का इस्तेमाल पेट्रोल में मिलाए जाने वाले एथेनॉल के उत्पादन में करने की व्यवस्था को बढ़ावा दिया। इससे चीनी मिलों को अतिरिक्त आय मिली और किसानों को समय पर भुगतान करने में मदद मिली।
20 अगस्त 2026 तक मौजूदा मौसम का करीब 97 प्रतिशत गन्ना बकाया किसानों को चुकाया जा चुका है।
सरकार पर सब्सिडी का बोझ भी घटा
सरकार के अनुसार, चीनी मिलों की आर्थिक स्थिति बेहतर होने के बाद उन्हें सरकारी सहायता की आवश्यकता भी कम हुई है।
2014 से 2021 के बीच सरकार ने चीनी मिलों को करीब 14,600 करोड़ रुपए की सहायता दी थी। हालांकि 2021-22 के बाद सरकार को इस क्षेत्र के लिए नई सब्सिडी देने की आवश्यकता नहीं पड़ी।
सरकार का कहना है कि एथेनॉल उत्पादन से चीनी मिलों को अतिरिक्त आय का स्रोत मिला और इससे गन्ना किसानों के भुगतान की स्थिति में भी सुधार हुआ।
एक महीने में चीनी ₹7.50 प्रति किलो महंगी
देश के खुदरा बाजार में पिछले एक महीने के दौरान चीनी की कीमत में तेज बढ़ोतरी हुई है।
20 जुलाई को चीनी का औसत भाव करीब 48.18 रुपए प्रति किलो था। 20 अगस्त को यह बढ़कर 55.70 रुपए प्रति किलो हो गया। यानी एक महीने में चीनी करीब 7.50 रुपए प्रति किलो महंगी हुई है।
सरकार के अनुसार, कीमतों में इस तेजी के पीछे उत्पादन में कमी, त्योहारों के दौरान मांग बढ़ना और बाजार में जमाखोरी जैसे कारण प्रमुख हैं।
दुनिया में भी चीनी की आपूर्ति कम होने का अनुमान
चीनी की कीमतों में तेजी केवल भारत तक सीमित नहीं है। वैश्विक बाजार में भी आपूर्ति से जुड़ी चिंता बनी हुई है।
सरकारी अनुमान के अनुसार, 2026-27 में दुनिया भर में करीब 33 लाख टन चीनी की कमी हो सकती है। वैश्विक स्तर पर उत्पादन और आपूर्ति में संभावित कमी का असर अंतरराष्ट्रीय कीमतों पर भी दिखाई दे रहा है।
50 दिन में वैश्विक कीमत 16 प्रतिशत से ज्यादा बढ़ी
अंतरराष्ट्रीय बाजार में पिछले करीब 50 दिनों में चीनी के भाव में तेज बढ़ोतरी हुई है। 30 जून को चीनी की कीमत करीब 474 डॉलर प्रति टन थी, जो 20 अगस्त तक बढ़कर 552 डॉलर प्रति टन हो गई।
इस अवधि में अंतरराष्ट्रीय कीमत में 16 प्रतिशत से ज्यादा की वृद्धि हुई है। इससे साफ है कि चीनी की कीमतों पर घरेलू परिस्थितियों के साथ-साथ वैश्विक बाजार का असर भी पड़ रहा है।
अक्टूबर में 10 लाख टन उत्पादन का लक्ष्य
सरकार ने घरेलू बाजार में आपूर्ति बढ़ाने और कीमतों को नियंत्रित रखने के लिए उत्पादन पर भी ध्यान बढ़ाया है। अक्टूबर में करीब 10 लाख टन चीनी उत्पादन का लक्ष्य रखा गया है।
सरकार को उम्मीद है कि उत्पादन और बाजार में उपलब्धता बढ़ने से आपूर्ति की स्थिति बेहतर होगी। इसके साथ ही भंडारण सीमा और शुल्क मुक्त आयात जैसे कदमों से जमाखोरी पर नियंत्रण रखने की कोशिश की जा रही है।
फिलहाल सरकार का कहना है कि चीनी की मौजूदा महंगाई का मुख्य कारण एथेनॉल उत्पादन नहीं, बल्कि कम उत्पादन, बढ़ी मांग, जमाखोरी और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में तेजी है।

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