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लाइट हाउस प्रोजेक्ट में सीपेज और दरार पर केंद्र का हाईकोर्ट में जवाब, तकनीकी खामी से किया इनकार


केंद्र ने कहा- निर्माण तय मानकों के अनुरूप हुआ, आईआईटी मद्रास ने की गुणवत्ता की निगरानी; कुछ फ्लैटों में अनधिकृत बदलाव और व्यावसायिक उपयोग को बताया समस्या की वजह

इंदौर के कनाड़िया रोड स्थित लाइट हाउस प्रोजेक्ट में सीपेज, दीवारों में दरार और लिफ्ट की खराबी को लेकर चल रहे विवाद पर केंद्र सरकार ने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ में अपना जवाब प्रस्तुत किया है। आवास एवं शहरी कार्य मंत्रालय की ओर से दाखिल 42 बिंदुओं के शपथ पत्र में प्रोजेक्ट के निर्माण में किसी भी तरह की तकनीकी या ढांचागत कमी होने से इनकार किया गया है।

केंद्र सरकार का कहना है कि लाइट हाउस प्रोजेक्ट का निर्माण निर्धारित तकनीक और गुणवत्ता मानकों के अनुसार किया गया है। निर्माण कार्य की गुणवत्ता की स्वतंत्र निगरानी के लिए आईआईटी मद्रास को जिम्मेदारी दी गई थी। मंत्रालय ने प्रोजेक्ट में सामने आई सीपेज और अन्य समस्याओं के लिए कुछ रहवासियों द्वारा फ्लैटों में किए गए बदलाव, आवासीय इकाइयों के व्यावसायिक उपयोग तथा रखरखाव में हुई देरी को जिम्मेदार ठहराया है।

याचिका खारिज करने की मांग

यह मामला याचिकाकर्ता नरेंद्र गोस्वामी की ओर से दायर याचिका से जुड़ा है। केंद्र सरकार ने हाईकोर्ट में अपने जवाब के माध्यम से याचिका खारिज किए जाने का अनुरोध किया है।

शपथ पत्र में बताया गया है कि कनाड़िया रोड और देवगुराड़िया क्षेत्र में प्रधानमंत्री आवास योजना शहरी के तहत लाइट हाउस प्रोजेक्ट का निर्माण करीब 128 करोड़ रुपए की लागत से किया गया है। परियोजना में एस प्लस 8 संरचना के तहत कुल 1024 फ्लैट बनाए गए हैं। इनमें से करीब 980 परिवारों को आवास का कब्जा सौंपे जाने की जानकारी दी गई है।

एक आवास की लागत करीब 12.50 लाख रुपए बताई गई है। इसमें केंद्र सरकार की ओर से 5.50 लाख रुपए, राज्य सरकार और नगर निगम की ओर से एक लाख रुपए तथा लाभार्थी की ओर से छह लाख रुपए का अंशदान शामिल है।

आधुनिक तकनीक से हुआ निर्माण

केंद्र के अनुसार, परियोजना का निर्माण नासिक की मेसर्स केपीआर प्रोजेक्टकॉन प्राइवेट लिमिटेड ने किया है। इसमें मेसर्स राइजिंग जापान इंफ्रा प्राइवेट लिमिटेड की निर्माण तकनीक का इस्तेमाल किया गया।

वर्ष 2019 में ग्लोबल हाउसिंग टेक्नोलॉजी चैलेंज-इंडिया के तहत देश में आधुनिक निर्माण तकनीकों का चयन किया गया था। इंदौर परियोजना के लिए प्रीफैब्रिकेटेड सैंडविच पैनल सिस्टम और प्री-इंजीनियर्ड स्टील स्ट्रक्चरल सिस्टम तकनीक को चुना गया था।

कई संस्थानों के विशेषज्ञों ने की तकनीक की जांच

मंत्रालय ने अपने जवाब में बताया कि निर्माण तकनीक और भवन के नक्शों की विशेषज्ञों की ओर से जांच की गई थी। केंद्रीय लोक निर्माण विभाग के महानिदेशक की अध्यक्षता वाली तकनीकी समिति के साथ आईआईटी दिल्ली, आईआईटी बॉम्बे, केंद्रीय भवन अनुसंधान संस्थान रुड़की और भवन सामग्री एवं प्रौद्योगिकी संवर्धन परिषद के विशेषज्ञ इस प्रक्रिया में शामिल रहे।

निर्माण के दौरान आईआईटी मद्रास ने स्वतंत्र गुणवत्ता निगरानी की जिम्मेदारी संभाली। मंत्रालय के अनुसार, मई 2023 में आईआईटी मद्रास ने परियोजना की पूर्णता संबंधी रिपोर्ट भी प्रस्तुत की थी।

परियोजना का शिलान्यास 1 जनवरी 2021 को हुआ था, जबकि 5 अक्टूबर 2023 को इसका लोकार्पण किया गया।

फ्लैटों में बदलाव को लेकर भी उठे सवाल

केंद्र ने हाईकोर्ट में अपने जवाब के साथ निरीक्षण के दौरान ली गई तस्वीरें भी प्रस्तुत की हैं। शपथ पत्र के मुताबिक, मई और जून 2026 में केंद्र सरकार, बीएमटीपीसी और नगर निगम की संयुक्त टीम ने परियोजना का निरीक्षण किया था।

निरीक्षण के दौरान कुछ आवासों में बिना अनुमति किए गए बदलाव मिलने का दावा किया गया। केंद्र के अनुसार, कुछ रहवासियों ने फ्लैटों की दीवारों में परिवर्तन करने के साथ प्लंबिंग व्यवस्था में भी बदलाव किया। इसके अलावा कुछ आवासीय इकाइयों का उपयोग व्यावसायिक गतिविधियों के लिए किए जाने की बात कही गई है।

रखरखाव को लेकर भी केंद्र ने रखा पक्ष

केंद्र सरकार ने सीपेज और अन्य समस्याओं के संबंध में रखरखाव व्यवस्था में हुई देरी को भी अपने जवाब में प्रमुखता से रखा है। मंत्रालय का तर्क है कि भवन की मूल संरचना के साथ छेड़छाड़ और निर्धारित उपयोग से अलग गतिविधियां किए जाने से निर्माण संबंधी समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं।

अब हाईकोर्ट में मामले की अगली सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से केंद्र के जवाब पर अपना पक्ष रखा जाएगा। इसके बाद अदालत परियोजना में सामने आई शिकायतों और केंद्र की ओर से प्रस्तुत तथ्यों के आधार पर आगे की दिशा तय करेगी।

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