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मध्य प्रदेश भाजपा में बढ़ती संवादहीनता से अंदरूनी खींचतान तेज, दतिया उपचुनाव की हार ने उठाए सवाल

मध्य प्रदेश भाजपा में बढ़ती संवादहीनता से अंदरूनी खींचतान तेज, दतिया उपचुनाव की हार ने उठाए सवाल


भोपाल। मध्य प्रदेश भाजपा में बाहर से सबकुछ सामान्य नजर आ रहा है, लेकिन पार्टी के भीतर नेताओं और संगठन के बीच बढ़ती संवादहीनता को लेकर सवाल उठने लगे हैं। भाजपा की ताकत हमेशा से उसके मजबूत संगठन, कार्यकर्ताओं और वरिष्ठ नेताओं के बीच संवाद को माना जाता रहा है। हालांकि सरकार और संगठन के नेतृत्व में बदलाव के बाद वरिष्ठ नेताओं के साथ संवाद का स्तर कमजोर होने की चर्चाएं लगातार सामने आ रही हैं।

दतिया उपचुनाव को लेकर भी पार्टी के भीतर संवादहीनता को हार की एक प्रमुख वजह के तौर पर देखा जा रहा है। राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि पूर्व मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा को टिकट नहीं दिए जाने के संबंध में नेतृत्व की ओर से पहले से पर्याप्त संकेत नहीं दिए गए और उन्हें विश्वास में लेने की प्रक्रिया भी प्रभावी नहीं रही। वर्ष 2023 के विधानसभा चुनाव में हार के बावजूद डॉ. मिश्रा को क्षेत्र में मजबूत दावेदार माना जा रहा था और उनके समर्थकों को चुनाव में बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद थी।

वहीं, पूर्व प्रदेश अध्यक्ष वीडी शर्मा की चुनाव प्रचार में भूमिका को लेकर भी सवाल उठे। पार्टी के एक मजबूत संगठनात्मक चेहरे के रूप में पहचाने जाने वाले शर्मा को पर्याप्त जिम्मेदारी नहीं दिए जाने की चर्चाएं सामने आईं। पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की दतिया शहर में सभा कराने के बजाय बसई में कार्यक्रम कराने के निर्णय को लेकर भी पार्टी के भीतर अलग-अलग तरह की चर्चाएं हुईं।

भाजपा के अंदरूनी सूत्रों के अनुसार, इन घटनाओं ने संगठन के भीतर संवाद और समन्वय को लेकर सवाल खड़े किए हैं। हालांकि पार्टी नेतृत्व की ओर से इस तरह की चर्चाओं पर सार्वजनिक रूप से कोई स्पष्ट स्वीकारोक्ति सामने नहीं आई है।

इधर, सरकार से नाराजगी को लेकर समय-समय पर मुखर रहे वरिष्ठ नेताओं की सूची में अब पूर्व मंत्री अजय विश्नोई का नाम भी चर्चा में है। विश्नोई सोशल मीडिया के माध्यम से कई बार अपनी ही सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते नजर आए हैं। इससे संगठन और सरकार के बीच बेहतर समन्वय को लेकर बहस और तेज हुई है।

पार्टी के अंदरूनी हलकों में यह भी चर्चा है कि मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और प्रदेश संगठन के बीच फैसलों को लेकर अपेक्षित तालमेल नहीं बन पा रहा है। संगठन में मुख्यमंत्री के करीबी माने जाने वाले नेताओं की भूमिका को लेकर भी पार्टी के भीतर तरह-तरह की चर्चाएं हैं। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई है।

बताया जा रहा है कि प्रदेश भाजपा अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल को भी संगठन के भीतर चल रही गतिविधियों और नेताओं के बीच बढ़ती नाराजगी की जानकारी मिल रही है। इसी बीच मुख्यमंत्री और प्रदेश अध्यक्ष के बीच दूरी बढ़ने की चर्चाएं राजनीतिक गलियारों में जोर पकड़ रही हैं। हालांकि दोनों नेताओं की ओर से इस संबंध में कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है।

पार्टी के कई पदाधिकारियों और नेताओं में काम के बंटवारे, जिम्मेदारियों और महत्व दिए जाने को लेकर असंतोष की चर्चाएं भी सामने आ रही हैं। यदि संगठन और सरकार के बीच समन्वय मजबूत नहीं हुआ तथा वरिष्ठ नेताओं और कार्यकर्ताओं के साथ संवाद की प्रक्रिया दोबारा प्रभावी नहीं की गई तो इसका असर आने वाले समय में भाजपा के संगठनात्मक ढांचे पर पड़ सकता है।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि भाजपा जैसे कैडर आधारित संगठन के लिए संवाद, समन्वय और वरिष्ठ नेताओं को विश्वास में लेना बेहद महत्वपूर्ण है। समय रहते अंदरूनी मतभेदों को दूर नहीं किया गया तो इसका राजनीतिक नुकसान पार्टी को भविष्य में उठाना पड़ सकता है।

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