इंदौर। भागीरथपुरा में दूषित पानी से हुई मौतों की जांच से जुड़ी जनहित याचिका पर मंगलवार को मध्यप्रदेश हाईकोर्ट में महत्वपूर्ण सुनवाई हुई। याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता ने 600 से अधिक पन्नों वाली जांच रिपोर्ट को अध्ययन के लिए उपलब्ध कराने का अनुरोध किया था। अदालत ने रिपोर्ट को सार्वजनिक रूप से प्रसारित करने की अनुमति देने से इनकार कर दिया।
अदालत ने स्पष्ट किया कि जांच रिपोर्ट हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार के पास जमा है। संबंधित पक्षों के अधिवक्ता रजिस्ट्रार के समक्ष उपस्थित होकर रिपोर्ट का अध्ययन कर सकते हैं। रिपोर्ट की सामग्री को फिलहाल सार्वजनिक नहीं किया जाएगा।
सुनवाई के दौरान भागीरथपुरा की पुरानी घटना के साथ इंदौर में अब भी सामने आ रहे दूषित पेयजल के मामलों पर भी चर्चा हुई। अदालत ने नगर निगम से पूछा कि शहर के विभिन्न इलाकों में दूषित पानी की शिकायतों पर अब तक क्या कदम उठाए गए हैं।
दूषित पानी की आपूर्ति पर नगर निगम से जवाब मांगा
याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि भागीरथपुरा की घटना के बाद भी शहर के कुछ हिस्सों में दूषित पानी मिलने की शिकायतें सामने आ रही हैं। उन्होंने हाल में पानी के नमूनों की जांच से संबंधित प्रकाशित रिपोर्ट का भी उल्लेख किया।
इस पर हाईकोर्ट ने नगर निगम से जानना चाहा कि दूषित पानी की शिकायतों का संज्ञान लेकर अब तक क्या कार्रवाई की गई है। अदालत ने यह भी पूछा कि शहर के कई क्षेत्रों में लोगों तक स्वच्छ पेयजल क्यों नहीं पहुंच पा रहा है।
नगर निगम की ओर से जवाब प्रस्तुत करने के लिए अतिरिक्त समय मांगा गया। अदालत ने निगम को जवाब देने का अवसर प्रदान कर दिया।
भागीरथपुरा में 36 लोगों की मौत की जांच
भागीरथपुरा में 26 दिसंबर 2025 से 25 फरवरी 2026 के बीच दूषित पानी से जुड़ी बीमारी के कारण 36 लोगों की मौत होने का मामला सामने आया था। घटना के बाद इसकी परिस्थितियों और जिम्मेदारी तय करने के लिए जांच आयोग गठित किया गया था।
हाईकोर्ट ने 27 जनवरी 2026 को सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति सुशील कुमार गुप्ता की अध्यक्षता में जांच आयोग बनाया था। आयोग को दूषित पानी के कारण, संबंधित अधिकारियों की भूमिका, प्रभावित लोगों को उपलब्ध कराई गई सहायता और मुआवजे समेत विभिन्न पहलुओं की पड़ताल करनी थी।
आयोग ने 20 अगस्त को 600 से अधिक पन्नों की रिपोर्ट हाईकोर्ट में प्रस्तुत की थी।
रिपोर्ट में क्या निष्कर्ष निकला, अभी सामने नहीं आया
जांच रिपोर्ट सीलबंद होने के कारण फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि आयोग ने भागीरथपुरा में दूषित पानी के लिए किन कारणों को जिम्मेदार ठहराया है। संबंधित अधिकारियों या कर्मचारियों की भूमिका को लेकर भी रिपोर्ट में क्या निष्कर्ष निकाला गया है, इसकी जानकारी सार्वजनिक नहीं हुई है।
जांच के दौरान पेयजल पाइपलाइन में सीवेज के पानी के प्रवेश, पाइपलाइन में तकनीकी खराबी या क्षति तथा औद्योगिक प्रदूषण जैसी संभावनाओं की पड़ताल की गई थी।
मौतों और बीमारी के कारणों की भी हुई जांच
आयोग ने चिकित्सा अभिलेखों और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर यह भी जांचा कि दूषित पानी के कारण कितने लोग बीमार हुए। साथ ही 36 मौतों में कितनी मौतों का प्रत्यक्ष संबंध दूषित पानी से था, इस पहलू की भी जांच की गई।
अब रिपोर्ट अदालत के समक्ष होने के बाद अगली कानूनी प्रक्रिया पर निगाह है। वहीं, इंदौर में वर्तमान समय में दूषित पानी की शिकायतों को लेकर नगर निगम से मांगा गया जवाब भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
पुरानी त्रासदी के साथ मौजूदा जलापूर्ति व्यवस्था पर भी सवाल
भागीरथपुरा मामले की सुनवाई अब केवल पूर्व की घटना में जिम्मेदारी तय करने तक सीमित नहीं रही। शहर में दूषित पानी की मौजूदा शिकायतों का मुद्दा सामने आने के बाद पेयजल व्यवस्था की गुणवत्ता और निगरानी पर भी सवाल उठे हैं।
अदालत के अगले कदम और नगर निगम की ओर से प्रस्तुत किए जाने वाले जवाब से यह स्पष्ट होने की उम्मीद है कि दूषित पानी की शिकायतों पर स्थानीय प्रशासन ने अब तक क्या कार्रवाई की है।

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