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ट्विशा शर्मा केस में सीबीआई ने दाखिल की चार्जशीट, गिरिबाला और समर्थ सिंह पर दहेज मृत्यु समेत कई आरोप


भोपाल। ट्विशा शर्मा की मौत के मामले में केंद्रीय जांच ब्यूरो ने अपनी जांच पूरी करने के बाद अदालत में चार्जशीट दाखिल कर दी है। करीब 636 पन्नों की इस चार्जशीट में पूर्व न्यायाधीश गिरिबाला सिंह और उनके बेटे समर्थ सिंह को आरोपी बनाया गया है। दोनों के खिलाफ दहेज मृत्यु, क्रूरता और आत्महत्या के लिए दुष्प्रेरण समेत कई गंभीर धाराओं के तहत कार्रवाई की गई है।

चार्जशीट में भारतीय न्याय संहिता की धारा 80(2), 85, 108 और 3(5) के साथ दहेज प्रतिषेध अधिनियम की धारा 3 और 4 का उल्लेख किया गया है। जांच एजेंसी ने मामले से जुड़े दस्तावेज, गवाहों के बयान, डिजिटल सामग्री और फोरेंसिक साक्ष्यों के आधार पर अभियोजन की कार्रवाई आगे बढ़ाई है।

हालांकि चार्जशीट में लगाए गए आरोप अभी न्यायालय में साबित होना बाकी हैं। आरोपियों के खिलाफ अंतिम दोष सिद्धि अदालत में होने वाली सुनवाई और साक्ष्यों के परीक्षण के बाद ही तय होगी।

दहेज मृत्यु और क्रूरता की धाराएं लगाई गईं

मामले में भारतीय न्याय संहिता की धारा 80(2) दहेज मृत्यु से संबंधित है। धारा 85 पति या उसके रिश्तेदार की ओर से महिला के साथ क्रूरता के मामले में लागू होती है। धारा 108 आत्महत्या के लिए दुष्प्रेरण से जुड़ी है, जबकि धारा 3(5) एक से अधिक लोगों की साझा आपराधिक मंशा से संबंधित है।

इसके अलावा दहेज प्रतिषेध अधिनियम की धारा 3 दहेज लेने या देने से संबंधित है और धारा 4 दहेज की मांग को अपराध मानती है।

सीबीआई ने जांच में सामने आए तथ्यों के आधार पर इन धाराओं के तहत अदालत में अभियोजन की प्रक्रिया शुरू की है।

हाईकोर्ट के निर्देश के बाद दोबारा हुआ था पोस्टमार्टम

ट्विशा शर्मा की मौत के बाद मामले की शुरुआती जांच स्थानीय स्तर पर की गई थी। इसके बाद ट्विशा के परिवार ने जांच और पोस्टमार्टम को लेकर सवाल उठाते हुए हाईकोर्ट का रुख किया था।

हाईकोर्ट के निर्देश के बाद ट्विशा का दोबारा पोस्टमार्टम कराया गया। इसके बाद मामले की जांच सीबीआई को सौंप दी गई। सीबीआई ने जांच अपने हाथ में लेने के बाद मामले से जुड़े विभिन्न पहलुओं की नए सिरे से पड़ताल की।

डिजिटल साक्ष्यों और फोरेंसिक जांच पर भी जोर

जांच के दौरान सीबीआई ने आरोपियों और ट्विशा से जुड़े डिजिटल रिकॉर्ड की जांच की। इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों, संपर्कों और अन्य डिजिटल सामग्री का विश्लेषण किया गया।

जांच एजेंसी ने आवाज के नमूनों और दूसरे फोरेंसिक पहलुओं को भी जांच का हिस्सा बनाया। सीबीआई ने मामले में उपलब्ध तकनीकी साक्ष्यों को अन्य जांच सामग्री के साथ मिलाकर घटनाक्रम को समझने की कोशिश की।

डिजिटल साक्ष्यों से जुड़े कुछ पहलुओं को लेकर अदालत में भी सुनवाई हुई है। बचाव पक्ष की ओर से आवाज के नमूने लेने की प्रक्रिया में पारदर्शिता बनाए रखने की मांग की गई थी।

गिरिबाला और समर्थ सिंह न्यायिक हिरासत में

मामले में पूर्व न्यायाधीश गिरिबाला सिंह और उनके बेटे समर्थ सिंह दोनों आरोपी हैं। सीबीआई की पूछताछ के बाद दोनों को न्यायिक हिरासत में भेजा गया था। जुलाई में अदालत ने दोनों की न्यायिक हिरासत आगे बढ़ाई थी और सीबीआई को जांच पूरी कर रिपोर्ट पेश करने के लिए समय दिया गया था।

इससे पहले गिरिबाला सिंह की जमानत याचिका भी विशेष अदालत से खारिज हो चुकी है। अदालत ने मामले में लगाए गए आरोपों की गंभीरता को देखते हुए जमानत देने से इनकार किया था।

आवाज के नमूने को लेकर दोनों पक्ष आमने सामने

पिछली सुनवाई के दौरान सीबीआई ने अदालत को बताया था कि डिजिटल साक्ष्यों की जांच के लिए इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से जुड़ी जानकारी और आवाज के नमूने महत्वपूर्ण हैं। जांच एजेंसी का कहना है कि इन साक्ष्यों के विश्लेषण से मामले की जांच में मदद मिल सकती है।

वहीं बचाव पक्ष ने आवाज का नमूना लेने की प्रक्रिया को पारदर्शी तरीके से पूरा किए जाने की मांग की। इस मुद्दे पर दोनों पक्षों की ओर से अदालत के सामने तर्क रखे गए हैं।

अब अदालत में आगे बढ़ेगी सुनवाई

चार्जशीट दाखिल होने के बाद अब मामले की न्यायिक प्रक्रिया आगे बढ़ेगी। अदालत चार्जशीट में शामिल आरोपों और साक्ष्यों का परीक्षण करेगी। इसके बाद मामले में आगे की सुनवाई की प्रक्रिया चलेगी।

सीबीआई ने अपनी जांच के दौरान आरोपियों से पूछताछ के साथ घटनास्थल, डिजिटल रिकॉर्ड और फोरेंसिक साक्ष्यों से जुड़े कई पहलुओं की जांच की है। अब अदालत में इन साक्ष्यों की वैधानिकता और आरोपों की पुष्टि की प्रक्रिया होगी।

आरोप साबित होना अभी बाकी

चार्जशीट दाखिल होने का अर्थ यह नहीं है कि आरोप अदालत में साबित हो चुके हैं। सीबीआई ने जांच के आधार पर आरोप लगाए हैं और अब इन आरोपों पर न्यायालय में सुनवाई होगी।

अदालत में गवाहों के बयान, दस्तावेजी साक्ष्य, डिजिटल सामग्री और फोरेंसिक रिपोर्ट समेत अन्य प्रमाणों की जांच के बाद ही यह तय होगा कि आरोप कानूनी रूप से कितने प्रमाणित होते हैं। फिलहाल मामला न्यायिक प्रक्रिया के अधीन है।

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