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MPSWAN इंजीनियरों ने उठाया न्यूनतम वेतन का मुद्दा, 10 साल से कम भुगतान का आरोप

 

भोपाल। मध्य प्रदेश के सरकारी कार्यालयों को इंटरनेट कनेक्टिविटी उपलब्ध कराने वाले MPSWAN नेटवर्क से जुड़े इंजीनियरों ने वेतन को लेकर गंभीर शिकायत उठाई है। उनका आरोप है कि करीब एक दशक से उन्हें कुशल श्रेणी के कर्मचारियों के लिए निर्धारित न्यूनतम वेतन का पूरा लाभ नहीं दिया जा रहा है। इस संबंध में 233 BHQ इंजीनियरों ने मध्य प्रदेश राज्य इलेक्ट्रॉनिक विकास निगम और वर्तमान परियोजना संचालक कंपनी ओम्नीलिंक टेक्नोलॉजी से हस्तक्षेप कर समस्या का समाधान कराने की मांग की है।

इंजीनियरों का कहना है कि वे लंबे समय से नेटवर्क के संचालन और रखरखाव की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं, लेकिन इसके बावजूद उन्हें निर्धारित न्यूनतम पारिश्रमिक से काफी कम राशि मिल रही है। अब कर्मचारियों ने बकाया राशि का भुगतान करने के साथ वेतन व्यवस्था की जांच और जिम्मेदार पक्षों पर कार्रवाई की मांग उठाई है।

15,200 रुपए के बजाय 8 से 9 हजार मिलने का दावा

इंजीनियरों के अनुसार 1 अप्रैल 2026 से MPSWAN परियोजना का संचालन ओम्नीलिंक टेक्नोलॉजी के पास है। उनका कहना है कि परियोजना से संबंधित निविदा में श्रम कानूनों का पालन करने और कुशल श्रेणी के कर्मचारियों को निर्धारित न्यूनतम वेतन देने का प्रावधान किया गया है।

इंजीनियरों का दावा है कि 1 अप्रैल 2026 से कुशल श्रेणी के लिए न्यूनतम मासिक वेतन 15,200 रुपए निर्धारित है, लेकिन उन्हें वर्तमान में केवल 8,000 से 9,000 रुपए प्रतिमाह का भुगतान किया जा रहा है। इस हिसाब से प्रत्येक कर्मचारी को हर महीने लगभग 6,200 से 7,200 रुपए कम मिलने का आरोप है।

निविदा में अधिक राशि, कर्मचारियों को कम भुगतान का आरोप

कर्मचारियों ने आरोप लगाया है कि परियोजना की निविदा में एक इंजीनियर के लिए करीब 19 हजार रुपए प्रतिमाह का प्रावधान किया गया है। इसके बावजूद आउटसोर्स कर्मचारियों को इसका पूरा लाभ नहीं मिल रहा है।

इंजीनियरों का कहना है कि इससे पहले नेटलिन कंपनी के कार्यकाल में भी उन्हें निर्धारित न्यूनतम वेतन नहीं मिला था। अब परियोजना का संचालन नई कंपनी को मिलने के बाद भी वेतन से जुड़ी स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं हुआ है।

चार प्रमुख मांगें रखीं

BHQ Engineers की ओर से कर्मचारियों की चार प्रमुख मांगें सामने रखी गई हैं। इनमें सभी 233 इंजीनियरों को कुशल श्रेणी के अनुसार 15,200 रुपए प्रतिमाह न्यूनतम वेतन देने की मांग प्रमुख है।

इसके साथ ही 1 अप्रैल 2026 से बकाया राशि का भुगतान करने, बिना उचित कारण सेवा से हटाए गए कर्मचारियों को दोबारा काम पर लेने और कम वेतन दिए जाने के आरोपों की निष्पक्ष जांच कराने की मांग की गई है।

इंजीनियरों ने यह भी कहा है कि यदि जांच में नियमों का उल्लंघन सामने आता है तो संबंधित कंपनी या ठेकेदार के खिलाफ आवश्यक कार्रवाई की जानी चाहिए।

सरकारी कार्यालयों की इंटरनेट व्यवस्था संभालते हैं इंजीनियर

MPSWAN नेटवर्क के माध्यम से प्रदेश के अनेक सरकारी कार्यालयों को इंटरनेट कनेक्टिविटी उपलब्ध कराई जाती है। इसमें कलेक्ट्रेट, अनुविभागीय अधिकारी कार्यालय, तहसील, जनपद पंचायत, अस्पताल, महिला एवं बाल विकास विभाग, पंजीयक कार्यालय, पुलिस थाने और शिक्षा विभाग सहित कई महत्वपूर्ण संस्थान शामिल हैं।

इंजीनियरों का कहना है कि इन सरकारी संस्थानों में नेटवर्क को सुचारु बनाए रखने, तकनीकी खराबियों को दूर करने और कनेक्टिविटी की निगरानी करने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका है। नेटवर्क व्यवस्था में किसी तरह की तकनीकी समस्या आने पर संबंधित इंजीनियरों को तत्काल उसे ठीक करना पड़ता है।

इसके बावजूद निर्धारित पारिश्रमिक नहीं मिलने से कर्मचारियों में असंतोष बढ़ रहा है। उनका कहना है कि जिम्मेदारियां लगातार निभाने के बावजूद वेतन संबंधी अधिकारों की अनदेखी की जा रही है।

लंबे समय से भुगतान व्यवस्था को लेकर नाराजगी

इंजीनियरों का कहना है कि न्यूनतम वेतन से जुड़ी समस्या नई नहीं है। उनके अनुसार पिछले करीब 10 वर्षों से इस मुद्दे का स्थायी समाधान नहीं हो सका है। अलग-अलग कंपनियों के माध्यम से परियोजना का संचालन होने के बावजूद कर्मचारियों की वेतन संबंधी शिकायत बनी हुई है।

कर्मचारियों का कहना है कि लगातार कम भुगतान होने से उन्हें आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। अब वे चाहते हैं कि संबंधित विभाग इस मामले की गंभीरता से जांच कर निर्धारित वेतन और बकाया राशि का भुगतान सुनिश्चित करे।

मांगें नहीं मानीं तो न्यायालय जाने की तैयारी

इंजीनियरों ने चेतावनी दी है कि यदि उनकी मांगों पर जल्द कार्रवाई नहीं हुई तो वे कानूनी रास्ता अपनाएंगे। कर्मचारियों की ओर से मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की जबलपुर खंडपीठ में याचिका दायर करने की तैयारी की जा रही है।

अस्थायी आउटसोर्स कर्मचारी मोर्चा के अध्यक्ष वासुदेव शर्मा ने सरकार से मामले में तत्काल हस्तक्षेप करने की मांग की है। उन्होंने कहा कि कर्मचारियों को निर्धारित न्यूनतम वेतन और बकाया राशि दिलाई जाए तथा कम भुगतान किए जाने के आरोपों की जांच कर दोषी पाए जाने वाले पक्षों के खिलाफ कार्रवाई की जाए।

सरकार और संबंधित कंपनी के निर्णय पर नजर

अब कर्मचारियों की शिकायत पर मध्य प्रदेश राज्य इलेक्ट्रॉनिक विकास निगम, परियोजना संचालक कंपनी और संबंधित विभाग की ओर से क्या कदम उठाया जाता है, इस पर नजर रहेगी। कर्मचारियों का कहना है कि वे लंबे समय से अपनी जिम्मेदारियां निभा रहे हैं और उन्हें श्रम नियमों के अनुरूप पारिश्रमिक मिलना चाहिए।

यदि समय रहते समाधान नहीं हुआ तो मामला न्यायालय तक पहुंच सकता है। फिलहाल 233 इंजीनियरों ने न्यूनतम वेतन, बकाया भुगतान, सेवा से हटाए गए कर्मचारियों की बहाली और वेतन भुगतान में कथित अनियमितताओं की जांच की मांग को लेकर अपना पक्ष सामने रखा है।

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