तीन दशक से नियुक्तियों को लेकर उठते रहे सवाल, अवर सचिव से अतिरिक्त सचिव स्तर तक भर्ती प्रक्रिया बदलने की तैयारी
मध्यप्रदेश विधानसभा सचिवालय में लंबे समय से विवादों में रही नियुक्ति प्रक्रिया में बदलाव की तैयारी है। अवर सचिव, उप सचिव और अतिरिक्त सचिव स्तर के पदों पर भर्ती मध्यप्रदेश लोक सेवा आयोग के माध्यम से कराने के प्रस्ताव पर विचार किया जा रहा है। इसका उद्देश्य नियुक्तियों में पारदर्शिता बढ़ाने और योग्य उम्मीदवारों का चयन सुनिश्चित करना है।
विधानसभा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर के अनुसार, सचिवालय की प्रशासनिक व्यवस्था को अधिक प्रभावी और निष्पक्ष बनाने के लिए महत्वपूर्ण पदों पर भर्ती पीएससी के माध्यम से कराने पर विचार किया जा रहा है। इससे योग्य और सक्षम अभ्यर्थियों को अवसर मिलने की उम्मीद है।
1993 से नियुक्तियों को लेकर उठते रहे सवाल
विधानसभा सचिवालय में वर्ष 1993 से अब तक बाबू से लेकर अपर सचिव और सुरक्षा अधिकारी तक के पदों पर हुई नियुक्तियां कई बार विवादों में रही हैं। आरोप लगते रहे कि कुछ मामलों में निर्धारित नियमों और पात्रता शर्तों को नजरअंदाज कर नियुक्तियां या पदोन्नतियां की गईं।
पिछले करीब 30 वर्षों के दौरान बैकडोर नियुक्तियों के अलावा प्रतिनियुक्ति, अनिवार्य योग्यता पूरी किए बिना पदोन्नति और क्षेत्रीय आधार पर नियुक्तियों के आरोप भी सामने आते रहे हैं।
अलग-अलग कार्यकाल में उठे विवाद
श्रीनिवास तिवारी के कार्यकाल में सबसे अधिक सवाल
1993 से 2003 के बीच नियुक्तियों और पदोन्नतियों को लेकर कई गंभीर आरोप सामने आए। आरोपों के मुताबिक सत्यनारायण शर्मा को न्यूनतम योग्यता और टाइपिंग परीक्षा पास किए बिना नियुक्त किया गया और कुछ ही महीनों में बाबू से अवर सचिव के पद तक पहुंचाया गया।
इसी अवधि में सब इंजीनियर रमेश तिवारी और वेयरहाउसिंग विभाग से आए देवेंद्र तिवारी को सीधे सहायक यंत्री बनाए जाने का मामला भी चर्चा में रहा। अस्थायी नियुक्ति और प्रतिनियुक्ति के जरिए 25 से अधिक लोगों को समायोजित किए जाने का मामला जांच के बाद एफआईआर और बर्खास्तगी तक पहुंचा।
ईश्वरदास रोहाणी के समय भर्ती पर सवाल
उनके कार्यकाल में स्टेनोग्राफर और सुरक्षा गार्डों की भर्ती में नियमों की अनदेखी किए जाने के आरोप लगाए गए।
डॉ. सीतासरन शर्मा के कार्यकाल में कानूनी अड़चनें
इस दौरान सीधी भर्ती की प्रक्रिया विवादों में रही और कई मामलों में कानूनी अड़चनों का सामना करना पड़ा।
गिरीश गौतम के कार्यकाल में भी आरोप
इस अवधि में रिश्तेदारों और करीबी लोगों को नियुक्ति या पदोन्नति का लाभ दिए जाने के आरोप सामने आए। पुष्पेंद्र गौतम सहित अन्य नियुक्तियों और पदोन्नतियों से जुड़े मामले उच्च न्यायालय तक पहुंचे।
दैनिक वेतनभोगियों को बाद में स्थायी करने के आरोप
विधानसभा सचिवालय में बड़ी संख्या में कर्मचारियों को शुरुआत में छह-छह महीने की अवधि के लिए दैनिक वेतन पर रखा गया। बाद में इनमें से कई कर्मचारियों को स्थायी किए जाने की बात सामने आई। इनमें से कुछ कर्मचारी पदोन्नति पाकर अतिरिक्त सचिव जैसे वरिष्ठ पदों तक भी पहुंचे।
अब प्रमुख पदों पर भर्ती की प्रक्रिया को पीएससी से जोड़ने की कवायद को लंबे समय से उठ रहे नियुक्ति संबंधी सवालों के समाधान की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

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