मध्य प्रदेश में आने वाले समय में सड़क संपर्क को मजबूत करने के लिए बड़े स्तर पर नए प्रोजेक्ट शुरू करने की तैयारी है। सिंहस्थ से पहले प्रदेश में 50 हजार करोड़ रुपये से अधिक के सड़क कार्य शुरू किए जाने की योजना पर काम चल रहा है। प्रस्तावित नेटवर्क में भोपाल को प्रमुख केंद्र के रूप में विकसित करने की तैयारी है।
योजना के तहत भोपाल को इंदौर, जबलपुर, ग्वालियर और मंदसौर से सीधे और बेहतर सड़क मार्गों से जोड़ने का प्रस्ताव है। इन मार्गों के तैयार होने के बाद प्रमुख शहरों के बीच यात्रा का समय कम होने की उम्मीद है।
भोपाल से चार बड़े शहरों तक सीधा संपर्क
भोपाल-जबलपुर और भोपाल-ग्वालियर मार्ग के लिए टेंडर प्रक्रिया चल रही है। भोपाल-मंदसौर सड़क की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट तैयार की जा रही है। वहीं भोपाल और इंदौर के बीच नए ग्रीनफील्ड एक्सेस कंट्रोल्ड एक्सप्रेसवे का प्रस्ताव केंद्र सरकार की मंजूरी के लिए भेजा गया है।
ग्रीनफील्ड सड़क का मतलब ऐसे नए मार्ग से है, जिसे पुराने रास्ते को चौड़ा करने के बजाय अलग से तैयार किया जाता है। इसमें शहरों और गांवों से गुजरने वाले हिस्सों को बायपास या एलिवेटेड सड़क के जरिए पार करने की योजना बनाई जा सकती है।
भोपाल के आसपास भी सड़क नेटवर्क का विस्तार
मुख्य सड़कों के अलावा भोपाल के पूर्वी और पश्चिमी हिस्से में बायपास बनाने की योजना भी प्रस्तावित है। भोपाल-विदिशा मार्ग को फोरलेन करने की तैयारी है। इन कार्यों से शहर के भीतर भारी वाहनों का दबाव कम करने और आसपास के क्षेत्रों से बेहतर कनेक्टिविटी बनाने में मदद मिलने की उम्मीद है।
प्रस्तावित ग्रीनफील्ड मार्गों में दो शहरों के बीच अपेक्षाकृत कम दूरी वाला नया रास्ता चुना जाएगा। इसके लिए हवाई दूरी और भौगोलिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए मार्ग तय किए जा रहे हैं।
कई मार्गों की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट तैयार हो रही
प्रदेश में कई सड़क परियोजनाओं की डीपीआर तैयार की जा रही है। इनमें प्रमुख मार्ग शामिल हैं।
नर्मदापुरम-पिपरिया के बीच करीब 101 किलोमीटर लंबे फोरलेन मार्ग की अनुमानित लागत 2,100 करोड़ रुपये बताई गई है। करेली-पिपरिया मार्ग करीब 71 किलोमीटर का होगा, जिसकी अनुमानित लागत 1,420 करोड़ रुपये है।
जबलपुर-नरसिंहपुर मार्ग की लंबाई करीब 84.5 किलोमीटर प्रस्तावित है और इसकी संभावित लागत 1,690 करोड़ रुपये बताई गई है। खलघाट-मनावर मार्ग करीब 43 किलोमीटर लंबा होगा, जिसकी अनुमानित लागत 858 करोड़ रुपये रखी गई है।
इंदौर-नेमावर मार्ग करीब 127 किलोमीटर लंबा प्रस्तावित है और इसकी लागत करीब 2,540 करोड़ रुपये आंकी गई है। हरदा-आशापुर मार्ग करीब 72 किलोमीटर का होगा।
राहतगढ़-खुरई-खिमलासा मार्ग की लंबाई करीब 47.48 किलोमीटर प्रस्तावित है। सुंदरा-सिंहपुर-कोठी-बिरसिंहपुर-सेमरिया-गोधा मार्ग करीब 98 किलोमीटर लंबा होगा। रातना-मैहर-बरही और विदिशा-अहमदपुर मार्ग भी प्रस्तावित सड़क योजनाओं में शामिल हैं।
सागर-सतना मार्ग में करीब 76 किलोमीटर की कमी
सागर-सतना के बीच प्रस्तावित ग्रीनफील्ड फोरलेन सड़क को बीओटी मॉडल पर बनाने की योजना है। इसकी अनुमानित निर्माण लागत करीब 9,850 करोड़ रुपये बताई गई है।
वर्तमान में दोनों शहरों के बीच सड़क दूरी करीब 294 किलोमीटर है। नए मार्ग की लंबाई लगभग 218 किलोमीटर प्रस्तावित है। मौजूदा मार्ग से यात्रा में करीब 6 से 7 घंटे लगते हैं, जबकि नए रास्ते के बनने के बाद यह समय लगभग 3 से साढ़े 3 घंटे तक आने का अनुमान है।
कटनी-सिंगरौली मार्ग से भी समय कम होने की उम्मीद
कटनी से सिंगरौली के बीच मौजूदा सड़क दूरी करीब 299 किलोमीटर है। इस मार्ग पर यात्रा में लगभग 6 घंटे 15 मिनट लगते हैं। प्रस्तावित ग्रीनफील्ड मार्ग करीब 232 किलोमीटर लंबा होगा।
नया मार्ग तैयार होने के बाद यात्रा का समय करीब साढ़े 3 घंटे रहने का अनुमान है। इस तरह दोनों शहरों के बीच सफर में लगभग पौने 3 घंटे तक की कमी आ सकती है।
कई परियोजनाओं पर अलग-अलग वित्तीय मॉडल से काम
इन सड़क परियोजनाओं को पूरा करने के लिए अलग-अलग वित्तीय मॉडल अपनाए जा रहे हैं। भोपाल-इंदौर मार्ग को छोड़कर बाकी प्रस्तावित सड़कों में बड़ी भूमिका मध्य प्रदेश सड़क विकास निगम की होगी।
मुख्य सचिव अशोक बर्णवाल ने हाल में प्रस्तावित सड़क परियोजनाओं की समीक्षा की है। समीक्षा के दौरान अलग-अलग मॉडल से तैयार किए जा रहे प्रोजेक्ट और उनकी प्रगति पर जानकारी ली गई। कई मार्गों की डीपीआर अभी तैयार होने की प्रक्रिया में है।
डीपीआर पूरी होने के बाद परियोजनाओं की वास्तविक लागत में बदलाव संभव है। ऐसे में पूरे सड़क नेटवर्क की अनुमानित लागत 50 हजार करोड़ रुपये से भी अधिक हो सकती है।
हाइब्रिड एन्यूटी मॉडल से भी बनेंगी सड़कें
कुछ परियोजनाओं में हाइब्रिड एन्यूटी मॉडल यानी एचएएम का इस्तेमाल किया जा रहा है। इस व्यवस्था में सड़क निर्माण के लिए सरकार और निजी कंपनी मिलकर निवेश करते हैं।
इस मॉडल के तहत परियोजना की कुल लागत का करीब 40 प्रतिशत हिस्सा सरकार उपलब्ध कराती है, जबकि शेष राशि निजी कंपनी अपने संसाधनों या कर्ज के माध्यम से जुटाती है। सरकार की ओर से दिया जाने वाला हिस्सा निर्धारित किस्तों में जारी किया जाता है।
निजी कंपनी द्वारा लगाए गए धन का भुगतान सरकार लंबी अवधि में ब्याज सहित करती है। सड़क तैयार होने के बाद टोल से मिलने वाला राजस्व सरकार के पास रहता है। उज्जैन के आसपास की कुछ सड़क परियोजनाओं में भी इसी तरह की व्यवस्था अपनाई जा रही है।
यात्रा आसान होने की उम्मीद
प्रस्तावित सड़क नेटवर्क का उद्देश्य प्रदेश के प्रमुख शहरों और क्षेत्रों के बीच संपर्क बेहतर करना है। नए मार्गों के कारण कई स्थानों के बीच दूरी और यात्रा समय घटने की संभावना है। इसके साथ ही शहरों के भीतर यातायात का दबाव कम करने, माल परिवहन को आसान बनाने और औद्योगिक तथा व्यापारिक गतिविधियों को बढ़ावा देने में भी इन परियोजनाओं की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है।
फिलहाल कई परियोजनाएं योजना और डीपीआर के चरण में हैं, जबकि कुछ मार्गों पर टेंडर प्रक्रिया आगे बढ़ चुकी है। मंजूरी और अन्य औपचारिकताएं पूरी होने के बाद इन परियोजनाओं के निर्माण की दिशा में काम तेजी से आगे बढ़ने की उम्मीद है।

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