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प्रार्थना की आवाज सुनकर धर्मांतरण का आरोप लगाना चिंताजनक: ईसाई धर्मगुरु ने UCC पर जताई आपत्ति

भोपाल। मध्य प्रदेश समान नागरिक संहिता विधेयक 2026 को लेकर मुस्लिम और अन्य अल्पसंख्यक समुदायों के धर्मगुरुओं तथा विधि विशेषज्ञों ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर अपनी चिंताएं सामने रखीं। ईसाई धर्मगुरु अनिल मार्टिन ने धार्मिक स्वतंत्रता और प्रस्तावित कानून के प्रावधानों को लेकर सवाल उठाए।

उन्होंने कहा कि संविधान प्रत्येक नागरिक को अपने धर्म का पालन करने और धार्मिक गतिविधियां करने की स्वतंत्रता देता है। ऐसे में घरों में होने वाली धार्मिक गतिविधियों को लेकर भी यदि संदेह या कार्रवाई की स्थिति बनती है, तो यह धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार के लिए चिंता का विषय होगा।

प्रार्थना की आवाज को धर्मांतरण से जोड़ने पर सवाल

अनिल मार्टिन ने कहा कि कई बार घरों में होने वाली प्रार्थना की आवाज सुनकर लोगों पर धर्मांतरण जैसी गतिविधियों के आरोप लगा दिए जाते हैं। उन्होंने इसे चिंताजनक स्थिति बताते हुए कहा कि केवल धार्मिक गतिविधि या प्रार्थना को किसी दूसरे व्यक्ति का धर्म बदलने से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए।

उनके मुताबिक धार्मिक स्वतंत्रता का अर्थ केवल पूजा स्थल तक सीमित नहीं है। लोगों को अपने घरों में भी शांतिपूर्ण तरीके से धार्मिक गतिविधियां करने का अधिकार होना चाहिए।

UCC के प्रावधानों को लेकर चिंता

प्रेस कॉन्फ्रेंस में वक्ताओं ने समान नागरिक संहिता विधेयक 2026 के विभिन्न प्रावधानों पर चर्चा की। धर्मगुरुओं और विधि विशेषज्ञों ने कहा कि किसी भी नए कानून का उद्देश्य नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करना होना चाहिए।

ईसाई धर्मगुरु ने विशेष रूप से धार्मिक गतिविधियों और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े पहलुओं पर स्पष्टता की जरूरत बताई। उन्होंने कहा कि कानून में ऐसे प्रावधान नहीं होने चाहिए, जिनके कारण सामान्य धार्मिक गतिविधियों को लेकर लोगों में भय पैदा हो।

संविधान में धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार

अनिल मार्टिन ने संविधान में नागरिकों को मिले धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने धर्म को मानने, उसका पालन करने और उससे जुड़ी गतिविधियां करने का अधिकार है।

उन्होंने कहा कि धार्मिक गतिविधियों और धर्मांतरण के बीच स्पष्ट अंतर किया जाना जरूरी है। किसी व्यक्ति की प्रार्थना, धार्मिक आयोजन या आस्था को स्वतः धर्मांतरण की गतिविधि मानना उचित नहीं होगा।

अल्पसंख्यक समुदायों ने मांगी स्पष्टता

प्रेस कॉन्फ्रेंस में मौजूद अल्पसंख्यक समुदायों के प्रतिनिधियों और विधि विशेषज्ञों ने भी प्रस्तावित कानून के प्रभाव को लेकर अपनी चिंताएं रखीं। उनका कहना है कि कानून लागू करने से पहले इसके सामाजिक और संवैधानिक प्रभावों पर व्यापक चर्चा होनी चाहिए।

धर्मगुरुओं ने सरकार से मांग की कि धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े प्रावधानों को स्पष्ट किया जाए, ताकि सामान्य धार्मिक गतिविधियों और कानून के उल्लंघन के बीच अंतर साफ रहे।

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