मध्यप्रदेश पुलिस दूरसंचार विभाग में सहायक उप निरीक्षक रेडियो पद पर वर्ष 2026 में हुई पदोन्नति प्रक्रिया विवादों में घिर गई है। रिव्यू डीपीसी के बाद 20 कर्मचारियों की पदोन्नति रद्द कर उन्हें वापस प्रधान आरक्षक रेडियो के पद पर भेज दिया गया है। प्रभावित कर्मचारियों ने वरिष्ठता तय करने के तरीके पर सवाल उठाए हैं।
कर्मचारियों का कहना है कि वरिष्ठता निर्धारित करने के लिए विभाग ने कंबाइंड सेलेक्ट लिस्ट की जगह प्रवर्गवार उपयुक्तता सूची को आधार बनाया। उनका तर्क है कि पदोन्नति नियमों के मुताबिक अलग-अलग प्रवर्गों की चयन सूचियां तैयार होने के बाद संयुक्त चयन सूची बनाई जानी चाहिए और इसी के आधार पर कर्मचारियों की इंटर-से वरिष्ठता तय होनी चाहिए।
2015 के दो पदोन्नति आदेश बने विवाद की वजह
विवाद की एक प्रमुख वजह वर्ष 2015 में आरक्षक रेडियो से प्रधान आरक्षक रेडियो पद पर हुई पदोन्नति से जुड़े दो आदेश हैं। 1 जनवरी 2014 की आरक्षक रेडियो ग्रेडेशन सूची में कर्मचारियों के नाम के सामने मेरिट सूची के क्रमांक दर्ज थे। इसके बाद 19 मई और 30 मई 2015 को प्रधान आरक्षक पद पर पदोन्नति के अलग-अलग आदेश जारी किए गए।
दोनों आदेशों पर कार्रवाई क्रमांक डी-807/15 समान था। प्रभावित कर्मचारियों का कहना है कि एक ही क्रमांक होने के कारण दोनों आदेश एक ही पदोन्नति प्रक्रिया का हिस्सा प्रतीत होते हैं।
कर्मचारियों ने मध्यप्रदेश लोक सेवा पदोन्नति नियम 2002 के नियम 6(8) से 6(12) का हवाला देते हुए कहा कि अलग-अलग प्रवर्गों की चयन सूचियां तैयार होने के बाद कंबाइंड सेलेक्ट लिस्ट बनाई जानी चाहिए। इसके बाद उसी संयुक्त सूची के आधार पर पदोन्नत कर्मचारियों की इंटर-से वरिष्ठता निर्धारित करने का प्रावधान है।
2025 की ग्रेडेशन सूची से उठे सवाल
वर्ष 2025 की प्रधान आरक्षक रेडियो ग्रेडेशन सूची में उपयुक्तता सूची वाले कॉलम में 01/2015 का उल्लेख तीन बार किया गया है। कर्मचारियों का दावा है कि इससे प्रवर्गवार उपयुक्तता सूची का संकेत मिलता है। हालांकि, उपलब्ध दस्तावेजों में संयुक्त चयन सूची का स्पष्ट उल्लेख दिखाई नहीं देता।
इसी बिंदु को लेकर कर्मचारियों ने वरिष्ठता निर्धारण की प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि यदि संयुक्त चयन सूची तैयार की गई थी तो उसका रिकॉर्ड और वरिष्ठता तय करने में उसके इस्तेमाल का आधार स्पष्ट किया जाना चाहिए।
2026 में पदोन्नति के बाद वापस पदावनत किया
वर्ष 2026 में सहायक उप निरीक्षक रेडियो पद के लिए जारी अनारक्षित सूची में प्रभावित कर्मचारियों में से एक का नाम 227वें क्रम पर था। इसी आधार पर उनकी पदोन्नति हुई और उन्होंने नए पद का कार्यभार भी संभाल लिया।
बाद में 13 जुलाई को पदोन्नति निरस्त कर दी गई। इसके बाद 20 जुलाई को संशोधित आदेश जारी किया गया, जिसमें संबंधित कर्मचारियों को फिर से प्रधान आरक्षक रेडियो पद पर कर दिया गया। रिव्यू डीपीसी के बाद कुल 20 कर्मचारियों पर इस फैसले का असर पड़ा है।
वरिष्ठता तय करने के आधार पर मुख्य सवाल
पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यह है कि रिव्यू डीपीसी के दौरान इंटर-से वरिष्ठता निर्धारित करने के लिए किस रिकॉर्ड को आधार बनाया गया। उपलब्ध दस्तावेजों से यह स्पष्ट नहीं हो रहा है कि नियम 6(11) के तहत तैयार कंबाइंड सेलेक्ट लिस्ट के आधार पर वरिष्ठता तय की गई या प्रवर्गवार उपयुक्तता सूची को आधार बनाकर क्रम में बदलाव किया गया।
प्रभावित कर्मचारियों का कहना है कि 2015 से लेकर 2026 तक की पदोन्नति और ग्रेडेशन प्रक्रिया से जुड़े सभी रिकॉर्ड सार्वजनिक किए जाने चाहिए। उनका कहना है कि इससे यह स्पष्ट हो सकेगा कि वरिष्ठता निर्धारित करने का वैधानिक आधार क्या था और उसमें बदलाव कब तथा किस आदेश के जरिए किया गया।
हाईकोर्ट में कैविएट की जानकारी
इस मामले में विभाग की ओर से जबलपुर हाईकोर्ट में कैविएट दायर किए जाने की जानकारी भी सामने आई है। इसमें संशोधित पदोन्नति आदेश से प्रभावित सभी 20 कर्मचारियों को पक्षकार बनाया गया है।
अब कर्मचारियों की मांग है कि पूरी पदोन्नति प्रक्रिया से जुड़े रिकॉर्ड सामने रखे जाएं और वरिष्ठता निर्धारण की प्रक्रिया को स्पष्ट किया जाए। उनका कहना है कि रिकॉर्ड के आधार पर ही यह तय हो सकेगा कि 2026 की पदोन्नति रद्द करने और डिमोशन का निर्णय नियमों के अनुरूप लिया गया है या नहीं।

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